जब राधा और कृष्ण की बात आती है तब सांसारिक दृश्टिकोण से सभी के मन में एक ही प्रश्न उठता है, यदि राधा और कृष्ण प्रेम कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं ?
व्यावहारिक दृष्टि से हम सभी को यही लगता है कि जो प्रेम स्त्री और पुरुष इस संसार में करते हैं वही प्रेम राधा और कृष्ण ने किया, पर कभी हमने यह जानने की कोशिश नहीं करते कि इसके पीछे की वास्तविकता क्या है ?
जिस सांसारिक स्त्री-पुरुष प्रेम के लिए हमारा समाज स्वयं विरोध करता आया है फिर चाहे वे लैला-मजनू या रोमियो- जूलिएट हो फिर कैसे वही समाज राधा - कृष्ण के इस अनैतिक प्रेम को इतना दिव्य मानेगा?
वास्तव में इस संसार में वास्तविक प्रेम है ही नहीं, वो तो बस काम है जो स्त्री-पुरुष को एक-दूसरे को बाँध के रखता है। वास्तविक प्रेम तो राधा और कृष्ण ने किया जिसकी महानता को हम आज भी स्वीकार करते हैं।
श्रीमती राधारानी कोई साधारण स्त्री नहीं है अपितु स्वयं भगवान श्री कृष्ण की आह्लादिनी शक्ति हैं और उनमें और कृष्ण में कोई अंतर् नहीं है, वे दो शरीर और एक प्राण हैं।
श्रीमती राधारानी के प्राकट्य का इतिहास अगर हम देखें तो सब कुछ स्पष्ट हो जायेगा कि किस प्रकार वे दिव्य हैं और उनकी दिव्यता ब्रह्मा और शिवजी नहीं समझ पाएं तो हमारी समझ से तो बिलकुल ही परे है।
जब हिमालय ने अपनी पुत्री पार्वती का विवाह शिवजी के साथ किया तो विंध्य पर्वत के मन में भी यही भाव आया कि मैं भी अपनी पुत्री का विवाह शिव जी से भी महान व्यक्ति से करूँ। उस हेतु उन्होंने बहुत ही तपस्या कि और तदोपरांत श्रीमती राधारानी का प्राकट्य हुआ और उनकी दिव्यता सभी दिशाओं में फ़ैल गयीं यहाँ तक की कंस ने भी जब यह सुना कि जो भी उस बालिका के हाँथ से भोजन करेगा वह अमर हो जायेगा तो उसने पूतना राक्षसी को भेजा।
पूतना राधारानी को लेकर कंस के पास जाती है तभी सभी साधु-संतो ने यज्ञ किया जिसके तेज से पूतना का हृदय जलने लगा और वह कंस के दरबार पहुंचने से पहले ही गोकुल के एक स्थान रावल में ही बालिका को हाँथ से गिरा दिया।
एक दिन राजा वृषभानु जब स्नान करने गएँ तब उन्होंने एक गुलाबी कमल में सूरज के सामान चमकते हुए एक बालिका को देखा तो वे उसे महल में लेकर आये और उनका नाम दिया राधा अर्थात रा - जो कृष्ण को अत्यंत आनंद प्रदान करती हैं और धा -जो संसार की सभी वस्तुओं को धारण करती हैं।
श्रीमती राधारानी के विषय में न तो कोई देव न देवी, स्वयं ब्रह्माजी, शिवजी, चारकुमार भी उनके गुणों से अपरिचित हैं तो हम जैसे विषयी जीव उनके विषय में क्या अठखेलियां लगाएंगे।
आइए हम सब मिलकर श्रीमती राधारानी से प्रार्थना करें कि वे हमें भगवान् की शरण में स्वीकार करें क्योंकि जब तक हमें श्रीमती राधारानी की कृपा नहीं प्राप्त होगी तब तक हमें कृष्ण प्रेम कदापि नहीं प्राप्त हो सकता।
जय - जय श्री राधेश्याम।

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