भगवान श्री कृष्ण वास्तव में भावग्राही हैं, यदि हम हृदय पूर्वक उन्हें श्रद्धा भाव से कुछ अर्पित करते हैं तो निश्चित रूप से वे उसे स्वीकार करते हैं फिर चाहे वह पत्ता, पुष्प, फल अथवा जल ही क्यों न हो।
श्रीमद भगवद्गीता में इसकी पुष्टि भगवान् श्री कृष्ण स्वयं करते हैं ९वे अध्याय के २६ वे श्लोक।
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।।९. २६।।
इसके उदाहरण भी हमें शास्त्र में प्राप्त होते हैं, वास्तव में ये सभी वस्तुएं बहुत ही आसानी से और बिना मूल्य के सभी स्थानों पर उपलब्ध है और कोई भी इनको प्राप्त कर सकता हैं।
पत्ता - इस सन्दर्भ में हम देखे तो भगवान् की एक लीला जो द्वारका में रुक्मिणी देवी और सत्यभामा के बीच संपन्न हुयी थी, सत्यभामा ने भगवान् श्री कृष्ण के बराबर तुला दान करने का समझौता किया था पर सब कुछ एक सिरे पर रख देने के बाद भी तूले का दूसरा सिरा हिला तक नहीं। फिर तुलसी का एक दल रखने मात्र से भगवान् का सिरा उठ गया।
पुष्प - श्रीमद भागवतम में गजेंद्र हांथी की कथा आती है, कैसे गजेंद्र और मगर का युद्ध हजार वर्षो तक चला और फिर असहाय होकर गजेंद्र करुणा वश अपनी सूढ़ से एक कमल का फूल उठाकर भगवान से प्रार्थना करता है, और भगवान् उसकी प्रार्थना स्वीकार कर तत्क्षण वहां प्रकट होकर गजेंद्र को मगर से मुक्त कर देते हैं।
फल - ब्रज में एक फल वाली रोज फल बेचने आती और नंदबाबा के घर कुछ फल देकर बदले में थोड़ा अनाज लेकर घर जाती। एक दिन जब यशोदा मैया कुछ कार्य में व्यस्त थी तभी वह फल वाली आती है और तभी छोटे कृष्ण अपने छोटे - छोटे हांथो में थोड़े अनाज के दाने भरकर लाते हैं और बदले में फल मांगते हैं।
फल वाली लाला के छोटे हांथो से कुछ दाने लेकर हांथो में फल पकड़ाकर चली जाती है। जैसे वह थोड़ी देर बाद देखती है तो उसकी टोकरी सभी रत्नों से भर जाती है।
जल - महाराज सत्यव्रत की कथा आती है कि किस प्रकार उन्होंने कृतमाला नदी में स्नान करते हुए जल का तर्पण करते भगवान् का ध्यान करते हैं और भगवान् तुरंत उनके सामने मत्स्य रूप में प्रकट हो जाते हैं।
भगवान् श्री कृष्ण की इन लीलाओं से हम समझ सकते हैं कि भगवान् श्री कृष्ण भावग्राही हैं और उन्हें मूलयवान वस्तुओं से ही नहीं अपितु साधारण वस्तुओं से भी प्रसन्न किया जा सकता हैं।
नन्द घर आनंद भयो जय कन्हैया लाल की!

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