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वैदिक जीवन शैली बनाम आधुनिक जीवन शैली - भाग २

 इसमें कोई  संदेह नहीं की अब हम वापस वैदिक जीवन शैली को शायद अपना पाए क्योंकि अब हम आध्यात्मिक और पारम्परिक भारतीय जीवन शैली से  इतने दूर आ चुके हैं की अब हमें इसे अपनाने में शर्मिंदगी महसूस होती है । 

अतः अब यह कहना बेकार है की हमें पुनः भारतीय परम्परागत जीवन शैली अपनाना चाहिए या सच कहा जाय तो शायद यह संभव भी न होगा, परन्तु एक बात तो हमें यह भी स्वीकारनी होगी कि आधुनिक जीवन शैली से भी हमारा किसी प्रकार से कल्याण नहीं होने वाला है। 

तो क्यों न दोनों में परस्पर सामंजस्य बिठाया जाय और आधुनिक जीवन शैली बिताने के साथ  - साथ हम थोड़े आध्यात्मिक जीवन को भी अपनाये जिससे हम स्वयं अपने आप को और आने वाली पीढ़ी को पतन से बचा पाए। क्योंकि स्वयं भगवान् श्री कृष्ण इस बात की पुष्टि करते हैं, कि यदि कोई थोड़ा भी आध्यात्मिक (भक्तिमार्ग) को अपनाता है तो उसे बड़े से बड़े संकटो से रक्षा हो सकती है और इसमें हमारा कोई नुकसान भी नहीं । 

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।

स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥ 2.40 ॥

इसीलिए भक्तिवेदांत स्वामी श्रील प्रभुपाद ने हमें केवल चार आधारभूत नियमों -

१. मांसाहार नहीं करना 

२. नशा नहीं करना 

३. अवैध स्त्री - पुरुष सम्बन्ध नहीं करना 

४. जुवा नहीं खेलना 

और इसके साथ - साथ भगवान श्री कृष्ण के पवित्र नाम का जप करना, 

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।  हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। 

और थोड़ी बहुत रोज भगवद गीता का पाठ कर लेना, सिर्फ इतना करने मात्र से भी हम भविष्य में आने वाले घोर से घोर संकट से बच सकते हैं। 

तो इस प्रकार का आध्यात्मिक जीवन को अपनाने में आपको क्या आपत्ति है, इसमें क्या मुश्किल है ? क्या कठिनाई है ??




हरे कृष्ण !

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