जहाँ तक मनुष्य इस भ्रम में रहता है कि वह सबसे सुखी और वैभव में जी रहा है, और शायद वह हमेशा ऐसा ही रहेगा, लेकिन हमारे शास्त्र हमें चेतावनी देते हैं कि हम भ्रम में न रहें। ब्रह्मा जी के सबसे ऊपर वाले ग्रह से लेकर सबसे निचले ग्रह तक सभी जीवों की अपनी-अपनी उम्र होती है और उन्हें निश्चित रूप से मृत्यु का सामना करना पड़ता है, आप इससे बच नहीं सकते।
अंतर केवल इतना है कि समय अवधि कम या अधिक हो सकती है लेकिन इस भौतिक दुनिया में कोई भी शाश्वत नहीं है।
श्रीमद्भागवतम् न केवल एक आध्यात्मिक ग्रंथ है बल्कि भौतिक संसार के बारे में भी हमे ज्ञान देता है जिसमें विज्ञान भी अभी बहुत पीछे है।
अगर हम स्वर्ग जैसे अन्य ग्रहों की अवधि के बारे में बात करते हैं तो विज्ञान के पास कोई जवाब नहीं है कि वहां जीवन कैसा है और वहां देवताओं की अवधि क्या है।
परन्तु श्रीमद्भागवतम् सर्ग 3.11.19 में इसके बारे में पूरी जानकारी देता है।
चत्वारि त्रीणि द्वै चैकं कृतादिषु यथाक्रमम् ।
संख्यातानि सहस्राणि द्विगुणानि शतानि च ॥ 3.11.19 ॥
देवताओं का एक वर्ष मनुष्य के 360 वर्ष के बराबर होता है।
इसलिए सतयुग की अवधि 4,800 × 360, या 1,728,000 वर्ष है। त्रेता-युग की अवधि 3,600 × 360, या 1,296,000 वर्ष है। द्वापर-युग की अवधि 2,400 × 360, या 864,000 वर्ष है। और अंतिम, कलियुग, 1,200 × 360, या 432,000 वर्ष है।
कलियुग के अभी लगभाग 5000 वर्ष ही पूर्ण हुए हैं। जिस प्रकार पृथ्वी पर मनुष्य की आयु १०० वर्ष मानी गई है ठीक उसी प्रकार स्वर्ग लोकों के निवासी भी उनकी गणना अनुसार १०० वर्ष जीते हैं।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
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