श्रीमद भागवतम और अन्य हमारे वैदिक ग्रन्थ इस बात के लिए सदैव हमें आगाह करते रहते हैं कि आप सतर्क रहें कि आपके जीवन का लक्ष्य क्या है ? पर अक्सर हम इस दुनिया के चकाचौध में भूल जाते हैं कि हमारा वास्तविक लक्ष्य क्या है और बिना लक्ष्य के या यूँ कहें तो निर्थक लक्ष्य को ही हम अपना लक्ष्य मान बैठते हैं।
इस देश के युवाओं में दो चीज मुख्य रूप से पायी जाती है, एक तो वे लक्ष्यविहीन जीवन जी रहे हैं और दूसरा फिर भी उनको अति आत्मविश्वास (औवरकॉन्फिडेन्स) है कि वे बिलकुल सही हैं उन्हें किसी के मार्गदर्शन की कोई आवश्यकता नहीं।
कल हमारी भेट कुछ नवयुवको के हुई और किस प्रकार वे भ्रमित और माया द्वारा पीड़ित है उसका हम कुछ वाकया आपके साथ साझा करना चाहते हैं और यह केवल उन दो - चार युवकों की बात नहीं अपितु सभी नवयुवकों को एक सन्देश है।
हम कुछ पुस्तकें उन्हे दिखा रहे थे और प्रेरित कर रहे थे कि अपने वैदिक ग्रंथों के बारे में आप जाने समझे और अपने जीवन को इस झूठे चका -चौध में बर्बाद न कर दे।
उसमें एक युवक अच्छी किस्म की घडी, महंगी बाईक, महंगे कपडे पहने हुआ था।
मैंने उसे प्रश्न किया, क्या वास्तव में इन सभी की आपको जरूरत है, यदि हाँ तो आपको जीवन में बहुत ज्यादा परिश्रम केवल इसलिए करना पड़ेगा कि क्योंकि आप कुछ समय के बाद इन सब चीजों के आदी हो जायँगे और फिर समाज को दिखाने के लिए आपको मजबूरन इन सब चीजों को करना पड़ेगा।
इस बात को उसने स्वीकार किया, कि हाँ मैं इन सब चीजों का आदि इसलिए बन गया हूँ क्योंकि मेरे अन्य दोस्त इसी तरह रहते हैं और मुझे भी ऐसा लगता है की उनके साथ यदि रहना है तो ऐसे ही रहना पड़ेगा, पर इन सभी चीजों को लेकर मैं मानसिक रूप से बहुत विक्षिप्त रहता हूँ।
खैर एक बात मुझे अच्छी लगी कि उसने इस बात को स्वीकार किया और उससे बचने का उपाय पूछा।
वास्तव में यह समस्या सभी वर्ग के लोंगो की है, सामाजिक, पारिवारिक, मित्रों इत्यादि के दबाव में आकर हमें कई ऐसे कार्य कर जाते हैं जिनके लिए हमें काफी नुक्सान उठाना पड़ जाता है और अक्सर उन वस्तुओं की हमारे जीवन में आवश्यकता भी नहीं रहती।
सर्वप्रथम हमें यह समझाना चाहिए कि हम चाहे कितना भी किसी वस्तु का भोग कर ले हमारी तृप्ति कभी नहीं हो सकती , जो बुद्धिमान व्यक्ति है वह भलीभांति जानता है की चीजें उसके जीवन में सुख कम दुःख ज्यादा देने वाली हैं इसलिए वह अपने पास कम से कम वस्तुओं का संग्रह करता है। और जितनी कम वस्तुएं हमारे पास रहेंगी उतना ज्यादा सुखी हम रहेंगे।
आज के युवा बेरोजगार इसलिए नहीं कि उन्हें नौकरी नहीं है वरन वे इसलिए बेरोजगार हैं कि उन्हें काम न करने के पैसे चाहिए और जिसके पास नौकरी है वह भी दुखी है क्योंकि उसकी आमदनी से ज्यादा उसके खर्चे हैं।
कर्दम मुनि के पास जब स्वम्भू मनु अपनी पुत्री देवहुति को लेकर जाते हैं तब कर्दम मुनि एक फटे- पुराने वस्त्रों में तपस्या कर रहे होते हैं पर जब माता देवहुति का उनके साथ विवाह हो जाता है तब उन्हें कुछ भोग - भोगने की इच्छा होती है, कर्दम मुनि समझ जाते हैं और अपने योगबल के द्वारा एक विशाल महल स्वर्ग में खड़ा कर देते है।
माता देवहुति १०० वर्षों तक भोग करती हैं तब उन्हें पता चलता हैं की इस भोग का कोई अंत नहीं फिर वे अपने पति कर्दम मुनि के पास जाकर उनसे आत्मबोध की प्रार्थना करती हैं जिसके उनका बचा जीवन भगवद प्राप्ति में उपयोग हो सके।
असली में भौतिक सुख हमें कभी बेहतर जिंदगी नहीं दे सकती बल्कि हमारी जिंदगी और बदतर बन जाती है, अनावश्यक तनाव, अथाह परिश्रम, समय से पहले बुढ़ापा, सम्बन्धो में दूरी।
यदि व्यक्ति को बेहतर जिंदगी चाहिए तो माता देवहुति की तरह आत्मबोध के लिए प्रयास करना चाहिए जो हमें शाश्वत आनंद दे सकता है।
कृपया अपने सुझाव अथवा टिप्पणी अवश्य साझा करें, धन्यवाद !
हरे कृष्ण !

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