श्रीमद भागवतम के तीसरे स्कंद के चौबीसवें अध्याय में जब कर्दम मुनि अपने पुत्र भगवान् श्री कपिल मुनि को कहते हैं की अब आपकी माँ देवहुति आपके संरक्षण में है कहकर वन गमन के लिए प्रस्थान करते हैं।
वहां पर भगवान् श्री कपिल मुनि अपनी माता देवहूति का पूर्ण रूप से संरक्षण करते है और साथ ही साथ वे उन्हें भगवत प्राप्ति का मार्ग भी दिखाते हैं जिससे वे अपने मनुष्य जन्म को सार्थक कर सके।
यह एक वैदिक परम्परा है की जब पुत्र बड़ा हो जाय तब उसे सभी जिम्मेदारी को सौंप कर पिता को भगवद्प्राप्ति में लग जाना चाहिए और एक पुत्र को भी चाहिए की अपने पिता की अनुपस्थिति में माता का पूर्ण रूप से ध्यान रखें जिससे उन्हें उनके पति की कमी न महसूस हो।
पर आज कल बच्चों में एक ऐसी मानसिकता देखी जा रही है कि जब वे कॉन्वेंट स्कूल या कालेजों में जाने लगते हैं तो उन्हें माता - पिता, दादा - दादी इत्यादि को लेकर बड़ी हीन भावना हो जाती है कि इन्हे तो अंग्रेजी बोलनी नहीं आती, इन्हे मॉडर्न कपडे पहनने नहीं आते और इस कारण वे सोचते हैं की ये लोग पिछड़े और अशिक्षित लोग हैं।
ऐसी ही घटना एक शिक्षित पीढ़ी के अशिक्षित आचरण की है कि एक दिन एक बच्चे को उसके पिता बाजार कुछ सामान खरीदने गएँ तभी वहां उसकी शिक्षिका मिल गयी और उसने तपाक से अपनी शिक्षिका को, "हाउ आर यू टीचर " कहकर सम्भोधित किया।
शिक्षिका ने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "आई एम् फाइन बेटा" और उसने उस बच्चे के पिता की ओर इंगित करते हुए कहा, "व्हू इज दिस ?"
बच्चे ने हड़बड़ाकर कहा, "टीचर, ही इज ऑवर केयर टेकर" .
और इस प्रकार दोनों अपने - अपने रस्ते को चले गए। पिता - पुत्र जब घर पर पहुँचते है तब पिता अपनी पत्नी को बुलाता है और जब तीनो एक साथ बैठते है तब पिता आँखों में आंसू लिए कहता है, बेटा मैंने सुना है अंग्रेजी में पिता को फादर या डैड कहते हैं पर तुमने जो अंग्रेजी बोली वो मुझे समझ नहीं आई उसका मतलब बताओगे।
बच्चा एक दम शांत हो जाता है क्योंकि उसको यह पता लग जाता है कि कहीं न कहीं मेरे पिता को सच्चाई का पता लग गया है। क्योंकि भाषा का प्रयोग तो केवल शब्दों को जोड़ने के लिए होता है पर असल में तो हृदय में स्थित परमात्मा हमारे भीतर की भी बातों को बिना बोले बता देते हैं।
ध्यान रहें ! आप अपने बच्चे को बड़े से बड़े स्कूल में क्यों न भेजे पर असलियत और अपने संस्कारों के साथ उसे नहीं जोड़ेंगे तो आप भी उसके पिता नहीं केयर टेकर बन जायेंगे।
क्योंकि आज की नौजवान पीढ़ी चकाचौंध में इतने भ्रमित हो गएँ हैं उन्हें लगता हैं कि बड़े - बुजुर्ग उनके रास्ते में एक कांटे की तरह हैं उन्हें जल्दी से छुटकारा चाहिए। जरा विचार कीजिये क्या हम इन्ही भविष्य के लिए अपना पूरा जीवन दांव पर लगा रहे हैं जिन्हे हमारी जरा भी चिंता नहीं है।
आप अपनी राय दे सकते हैं।
हरे कृष्ण !

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