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हम जानते हुए भी गलती क्यों करते हैं ?

प्रायः हम सभी का यही प्रश्न होता है और यह एक व्यक्ति का नहीं अपितु ९० प्रतिशत लोगों की समस्या है, की हम न चाहते हुए भी गलती क्यों कर बैठते हैं जबकि थोड़ी ही देर के पश्चात हम उसपर पछतावा करते हैं। 

तो इसका उत्तर हम भगवद गीता के अध्याय ३ श्लोक संख्या ३६ एवं ३७ में देखेंगे जो स्वयं अर्जुन भगवान् श्री कृष्ण से यही प्रश्न पूछते हैं कि, हे कृष्ण! मनुष्य न चाहते हुए भी पापकर्मों के लिए प्रेरित क्यों होता है? ऐसा लगता है उसे बलपूर्वक उनमें लगाया जा रहा हो। 

अर्जुन उवाच

अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।

अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥ ३.३६ ॥

भगवान् कृष्ण अर्जुन को उनके प्रश्नों का उत्तर देते हुए कहते हैं ,

श्री भगवानुवाच

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भ‍वः ।

महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥ ३. ३७ ॥

भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, अर्जुन ! इसका कारण रजोगुण के संपर्क से उत्पन्न काम है, जो बाद में क्रोध का रूप धारण करता है और जो इस संसार का सर्वभक्षी पापी शत्रु है। 

वास्तव में जीव न चाहते हुए पाप तभी करता है जब वह स्वंत्रता का दुरूपयोग करता है, प्रकृति के रजोगुण के प्रभाव के कारण जीव अपने आपको भोक्ता मानता है और सभी वस्तुओं का भोग करना चाहता है और इस प्रकार वह न करने वाले कर्मों को भी करता है। 

जैसे किसी मरीज को डाक्टर मीठा खाने से रोकता है पर मरीज के मन में मीठा खाने की ईच्छा बनी हुई है और उस ईच्छा की पूर्ति के लिए वह हर प्रयास करता है , और यदि उसकी ईच्छा नहीं पूरी होती तो क्रोध उत्पन्न होता है और क्रोध मोह में परिवर्तित होने के कारण वह अपनी बुद्धि का विनाश कर लेता है जिससे एक व्यक्ति का पतन हो जाता है। 

एक व्यक्ति को अपनी इच्छाओं को भगवान् की सेवा में परिवर्तित करना चाहिए जिससे उसके अशुद्ध काम को शुद्ध प्रेम में बदला जा सके और इस प्रकार यदि वह भगवान् की सेवा में क्रोध भी करता है तो उसका पतन नहीं अपितु उसका यश होता है , जिस प्रकार हनुमान जी ने भगवान् श्री राम की सेवा के लिए क्रोध किया और सम्पूर्ण लंका को भष्म कर दिया। 

यदि हम धीरे - धीरे अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर निःस्वार्थ भाव से भगवान् श्री कृष्ण की सेवा के प्रति अग्रसर होते हैं तब हमारी कामवासना पर हम विजय प्राप्त कर सकते हैं और वह संभव है भगवान् के विषय में श्रवण, कीर्तन और भगवान के भक्तों का नियमित संग। क्योंकि जिस प्रकार का हम संग करते हैं वैसा हमारा रंग चढ़ता है , एक व्यक्ति यदि चोर का संग करेगा तो आगे जाकर चोर ही बनेगा, साधु का संग करेगा तो साधु ही बनेगा।  हमें किसी भी तरीके से भगवान् की भक्ति में लगकर इस नरक के तीन द्वार काम, क्रोध, मोह (लोभ) से अपने आपको बचाना है। 

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हरे कृष्ण !

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