Skip to main content

हनुमान जी के विशेष गुण

आज श्री हनुमान जी के जन्मोत्सव पर हम भगवान् श्री राम के अनन्य भक्त की कुछ विशेष गुण की चर्चा करेंगे। हनुमान जी की प्रजाति ही स्वंय में एक विशेष है, वानर अर्थात पशु है या मनुष्य संस्कृत शब्द वा का अर्थ होता है अथवा। 

वैसे तो हनुमान जी असंख्य नाम है पर कुछ नाम जैसे बजरंग किस प्रकार यह नाम पड़ा, जब इंद्र ने राहु के कहने पर हनुमान जी को अपने वज्र से प्रहार किया और बाल हनुमान जब पृथ्वी पर अचेत अवस्था में गिर पड़े तब पवन देव के रुष्ट होने पर सभी देवता ब्रह्मा जी सहित आकर हनुमान जी को वरदान देते हैं। 

देवराज इंद्र वरदान स्वरुप अपने वज्र से हनुमान जी को स्पर्श करते हैं और कहते हैं , आज से आप का शरीर वज्र के जैसा मजबूत हो जायेगा और कोई भी आपको क्षति नहीं पहुंचा सकेगा और इस प्रकार तब से हनुमान जी का एक नाम वज्रांग बलि अर्थात बजरंग बली के रूप में विख्यात हुए। 

हनुमान जी के पास तो असंख्य गुण है, पर कुछ मुख्य गुणों की हम चर्चा करेंगे।

1. निःस्वार्थ सेवा भाव: जब प्रभु श्री राम रावण का वध कर और लंका पर विजय प्राप्त कर अयोध्या आये तब हनुमान जी को उन्होंने पूछा, मेरे प्रिय हनुमान यह युद्ध मैंने आपके सहयोग से जीता है और मैं चाहता हूँ उसके प्रति मैं तुम्हे कुछ सम्मान स्वरुप प्रदान करूँ। 

हनुमान जी विनीत भाव में प्रभु श्री राम से हाँथ जोड़ कर कहते हैं, हे नाथ वैसे तो सब कुछ आपकी कृपा से ही संभव हुआ है,

सो सब तब प्रताप रघुराई, नाथ न कछु मोरी प्रभुताई। 

फिर भी यदि आप मुझे कुछ देना चाहते हैं तो मुझे केवल एक ही वरदान दीजिये कि मैं सदैव आपकी चरणों में आश्रित रहूं अन्य कुछ भी नहीं। 

2. ईर्ष्या एवं द्वेष से परे: जब हनुमान जी लंका की तरफ चले तो सर्वप्रथम सुरसा राक्षसी ने उनके मार्ग का अवरोध किया और उसने कहा कि, ब्रह्माजी के वरदान स्वरुप तुम्हे मेरे मुख में प्रवेश करना होगा।  हनुमान जी का शरीर अत्यंत विशालकाय पर्वत की भांति है क्योंकि उन्हें अष्टसिद्धि प्राप्त है वे अपने शरीर को छोटे से भी छोटा और बड़े से बड़ा बना सकते हैं परन्तु यहाँ सुरसा से बिना द्वेष किये हनुमान जी अपने विशाल शरीर को छोटा कर उसके मुख में प्रवेश किया और यह देखकर सुरसा प्रसन्न हो गयी। 

3. पूर्ण रूप से इन्द्रियों और मन पर नियत्रण: वैसे स्वभाव से बन्दर अंत्यंत ही चंचल प्रवृत्ति के होते हैं, पर हम देखते हैं जब हनुमान जी लंका में प्रवेश कर रावण के शयन कक्ष में माता सीता को ढूढ़ने जाते हैं तब वहां अनेको स्त्रियों को अन्य - अन्य प्रकार से बेसुध सोये हुए पाते हैं, कुछ तो नशे में और कुछ थकावट के कारण, पर हनुमान जी अपनी इन्द्रियों और मन पर नियत्रण रखते हुए केवल अपने लक्ष्य की और केंद्रित थे। 

जो भी व्यक्ति अपने मार्ग में आने वाले सभी बाधाओं की तरफ ध्यान न देकर केवल अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ता है, वास्तव में केवल वही लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। 

4. प्रतिबद्धता: प्रभु श्री राम के कहने से हनुमान जी माता सीता को ढूढ़ने लंका गए पर उन्हें कई सारी कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा पर वे भगवान श्री राम के प्रति प्रतिबद्धता को बार - बार स्मरण कर रहे थे, कि माता सीता को किस प्रकार ढूढ़ सकू जिसके भगवान् राम को यह सुचना देकर मैं अपना कार्य पूर्ण कर सकू। 

जब व्यक्ति किसी कार्य को लेकर प्रतिबद्ध रहता है तब वह अपने निजी स्वार्थ या आराम के बारे में नही सोचता उसे केवल अपनी प्रतिज्ञा दिखाई देती है। 

5. भगवान् श्री राम के प्रति प्रेम: प्रभु श्री राम के प्रति हनुमान जी का अतिसय प्रेम है जिसका शब्दों में कोई आकार नहीं दिया जा सकता है। एक बार श्री राम अकेले बैठे थे और उनके हाँथ में एक डायरी थी तभी हनुमान जी वहां गए और उन्होंने बड़ी विनम्रता से पूछा, प्रभु यह क्या है?

श्री राम ने मुस्कुराते हुए कहा, मेरे प्रिय हनुमान इसमें मेरे भक्तो का नाम है जो मुझसे बहुत प्रेम करते हैं। 

हनुमान जी झट से वह डायरी ली और उसमे अपना नाम ढूढ़ने लगे पर उनका नाम कहीं भी नहीं दिखा, वे बड़े दुखी हुए। 

प्रभु श्री राम ने पूछा, क्या हुआ हनुमान?

इसमें मेरा नाम नहीं है प्रभु अर्थात मैं प्रिय भक्त नहीं हूँ आपका?

नहीं हनुमान मेरे पास एक और डायरी हैं जिसमें उन भक्तों के नाम है जिनसे मैं प्रेम करता हूँ , और जब हनुमान उसमें अपना नाम सबसे पहले पाते हैं तब प्रभु श्री राम के चरणों में गिर कर कर उन्हें प्रणाम करने लगते हैं। 

हनुमान जी का ध्यान करने मात्र से बड़े से बड़े संकट टल जाते हैं , उनके नाम से बिगड़े हुए कार्य बन जाते हैं और उनकी कृपा से भगवान् श्री राम की भक्ति हमें प्राप्त होती है क्योंकि ,

दुनिया चले न श्री राम के बिना , राम जी चले ना हनुमान के बिना। 



जय श्री राम ! जय हनुमान !


Comments

Popular posts from this blog

दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएँ

हमारा देश भारत सांस्कृतिक पर्वों का देश मना जाता है।  यहाँ पर न केवल विविध प्रकार के पर्व मनाये जाते है बल्कि उन पर्वों के पीछे कुछ न कुछ सामाजिक , पारम्परिक, सांसारिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक कारण भी हैं।  पर आज शायद हम उन्हें जाने सुने बिना बस केवल एक प्रकार से अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए सभी त्योहारों को मना रहे हैं , जो न केवल समाज को गुमराह कर रहा हैं अपितु हमारी अपनी आस्था को भी ठेस पहुंचाता है।  बिना प्रमाणिकता के बस अपनी सनक वश किसी कार्य को करना यह केवल एक रजोगुण का प्रभाव है, और इस कारन व्यक्ति अपनी संस्कृति, धर्म और आस्था को एक तरफ रखकर केवल दिखावेबाजी में त्योहारों को मना रहा है।  आइये हम सभी दिवाली पर्व के इन सभी पहलुओं पर एक छोटी सी झलक डालते हैं जिससे हमने पता चले कि आखिर हम यह त्यौहार मनाते क्यों हैं ? पारम्परिक कारण : चूँकि हम सभी भारत भूमि में जन्म प्राप्त किये है इसलिए हमारा यह परम सौभाग्य है कि हमें बचपन से परम्परागत तरीके से इन सभी त्योहारों की छवि बचपन से मिलती आ रही हैं।  सामाजिक कारण : हमारी देश की बहुत ही अच्छी बात जो विविधता में एकता देखन...

भक्त वत्सल भगवान का अद्भुत रूप

भगवान् अपने भक्तों की रक्षा करने किसी भी रूप में आ सकते हैं फिर चाहे वे मनुष्य रूप में श्री राम के रूप, साक्षात् अपने मूल स्वरुप भगवान् श्री कृष्ण के रूप में अथवा अपने अद्भुत अवतार आधे शेर और आधे मनुष्य (नरसिंह ) के रूप में इससे वे बाध्य नहीं है।  भगवान् भगवद गीता के ४थे अध्याय के ९वें श्लोक में अर्जुन को  बताते हैं, कि हे अर्जुन जो मेरे जन्म और कर्म को दिव्य मानता हैं वह फिर इस दुखालय जगत में फिर से नहीं आता।  भगवान् भौतिक संसार के जीवों के जैसे बाध्य नहीं की किसी माता के गर्भ से ही जन्म ले, इसी बात को सत्य करने और हिरण्यकश्यपु जैसे महान राक्षस के भय से और अपने प्रिय भक्त प्रह्लाद की रक्षा करने भगवान् नरसिंह खम्भे से प्रकट हुए।  हिरण्यकशिपु को भगवान ब्रह्मा से विशेष वरदान प्राप्त था कि वह किसी मनुष्य, देवता, पशु या किसी अन्य प्राणी द्वारा नहीं मारा जा सकता था।  उसे न तो दिन में और न ही रात में किसी भी तरह के हथियार से मारा जा सकता था। तो, भगवान आधे मनुष्य, आधे शेर के रूप में प्रकट हुए और सभी शर्तों को पूरा करते हुए गोधूलि के समय हिरण्यकशिपु को अपने नाखूनों से म...

महाभारत का असली विलेन कौन?

वैसे भगवद गीता को हमारा पुरातन और सनातन वैदिक ग्रन्थ माना जाता है, जो भगवान् ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को सुनाई। भगवद गीता में मुख्य रूप से चार पात्र स्वयं भगवान् श्री कृष्ण, अर्जुन, संजय और धृतराष्ट है, पर प्रश्न यह उठता है कि गीता में इतने पात्र होते हुए भी गीता धृतराष्ट से ही क्यों शुरू हुई? वास्तव में यदि हम महाभारत की पृस्ठभूमि देखें तो हम समझ पाएंगे कि धृतराष्ट सक्रीय रूप से खलनायक नहीं है पर वे अपने ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन की आड़ में सम्पूर्ण संपत्ति को हड़पना चाहते थे।  धृतराष्ट का अर्थ ही धृत अर्थात धारण करना और राष्ट्र अर्थात सम्पूर्ण राज्य, जो सम्पूर्ण राज्य को अकेले ही धारण करना चाहता है और वह किसी भी प्रकार से फिर चाहे पांडवों को जहर देकर मारने की योजना बनाकर, लाख्यागृह में आग लगाकर या छल द्वारा जुएं में हराकर भरी सभा में द्रौपदी को निर्वस्त्र करना। वास्तव में दुर्योधन जन्म से ही आसुरी स्वाभाव वाला था, इसीलिए धृतराष्ट के छोटे भाई महाराज विदुर धृतराष्ट को जाकर कहते हैं कि यह पुत्र बड़े ही अपशगुन के साथ जन्म लिया है और इसके लक्षण सम्पूर्ण कौरवों के विनाश को सूचित करता है, बे...