Skip to main content

आधुनिक शिक्षा अशिक्षा से भी ज्यादा खतरनाक

 आज से दशक पहले यदि हम देखें तो शिक्षा का स्तर उतना नहीं था जितना तथाकथित शिक्षित आज की युवा पीढ़ी है। आज की आधुनिक शिक्षा प्रणाली में एक छोटा बालक भी अपने आप को स्वतंत्र समझता है और अपने ही शिक्षक को आँख दिखाता है और सम्मान नहीं करता। 

आज के त्रुटिपूर्ण शिक्षा के कारण ही विश्वभर में युवा विद्यार्थी अपने शिक्षक एवं माता - पिता के लिए सिरदर्द बने हुए हैं। इस बात को हमें स्वीकार करना ही होगा कि शिक्षित वर्ग अनपढ़ वर्ग से ज्यादा खतरनाक साबित हो रहे हैं। 

आज एक अनपढ़ व्यक्ति केवल अपना व्यक्तिगत नुक्सान करता है, पर वहीँ एक पढ़ा लिखा पुरे समाज के लिए बीमारी बन जाता है, कारण उसकी बुद्धि एक अनपढ़ की तुलना में ज्यादा विकसित है।। 

आज स्कूल और कालेजों में न तो ब्रह्मचर्य की शिक्षा दी जा रही है और न ही उन्हें किसी शास्त्रीक ज्ञान की फिर उनके अंदर वास्तविक ज्ञान कैसे उत्पन्न होंगे क्योंकि कालेज और किताबी ज्ञान से वे केवल बुद्धि का अच्छी तरह दुरूपयोग करना ही सिखाया जा रहा है और हम उम्मीद करते हैं कि हमारी भावी पीढ़ी बड़ी उन्नत और समाज के लिए हितकर साबित होगी, यह तो उसी तरह हुआ जिस प्रकार चार चोर मिलकर चोरी करते हैं और आपस में ईमानदारी से बंटवारे की बात करते हैं। 

जब तक हमारे शिक्षा प्रणाली में धर्म , भगवद गीता का ज्ञान और पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री कृष्ण के बारे में जानकारी प्रदान नहीं की जाती तब तक यह आधुनिक ज्ञान दोषपूर्ण ही रहेगा और इससे न तो किसी बच्चे का और न ही समाज और देश के हित में होगा। 

जब तक कोई वास्तविक ज्ञान को प्राप्त नहीं करता तब तक उसे शिक्षक बनकर किसी बच्चे को उपदेश नहीं देना चाहिए, एक गुरू, पिता, पति और राजा का कर्तव्य है कि अपने आधीन का उद्धार करे अन्यथा दोनों नरक में जायेंगे। 

कृपया आप अपनी टिप्पणी कमेंट बोक्स में साझा करें। 


हरे कृष्ण !

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएँ

हमारा देश भारत सांस्कृतिक पर्वों का देश मना जाता है।  यहाँ पर न केवल विविध प्रकार के पर्व मनाये जाते है बल्कि उन पर्वों के पीछे कुछ न कुछ सामाजिक , पारम्परिक, सांसारिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक कारण भी हैं।  पर आज शायद हम उन्हें जाने सुने बिना बस केवल एक प्रकार से अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए सभी त्योहारों को मना रहे हैं , जो न केवल समाज को गुमराह कर रहा हैं अपितु हमारी अपनी आस्था को भी ठेस पहुंचाता है।  बिना प्रमाणिकता के बस अपनी सनक वश किसी कार्य को करना यह केवल एक रजोगुण का प्रभाव है, और इस कारन व्यक्ति अपनी संस्कृति, धर्म और आस्था को एक तरफ रखकर केवल दिखावेबाजी में त्योहारों को मना रहा है।  आइये हम सभी दिवाली पर्व के इन सभी पहलुओं पर एक छोटी सी झलक डालते हैं जिससे हमने पता चले कि आखिर हम यह त्यौहार मनाते क्यों हैं ? पारम्परिक कारण : चूँकि हम सभी भारत भूमि में जन्म प्राप्त किये है इसलिए हमारा यह परम सौभाग्य है कि हमें बचपन से परम्परागत तरीके से इन सभी त्योहारों की छवि बचपन से मिलती आ रही हैं।  सामाजिक कारण : हमारी देश की बहुत ही अच्छी बात जो विविधता में एकता देखन...

भक्त वत्सल भगवान का अद्भुत रूप

भगवान् अपने भक्तों की रक्षा करने किसी भी रूप में आ सकते हैं फिर चाहे वे मनुष्य रूप में श्री राम के रूप, साक्षात् अपने मूल स्वरुप भगवान् श्री कृष्ण के रूप में अथवा अपने अद्भुत अवतार आधे शेर और आधे मनुष्य (नरसिंह ) के रूप में इससे वे बाध्य नहीं है।  भगवान् भगवद गीता के ४थे अध्याय के ९वें श्लोक में अर्जुन को  बताते हैं, कि हे अर्जुन जो मेरे जन्म और कर्म को दिव्य मानता हैं वह फिर इस दुखालय जगत में फिर से नहीं आता।  भगवान् भौतिक संसार के जीवों के जैसे बाध्य नहीं की किसी माता के गर्भ से ही जन्म ले, इसी बात को सत्य करने और हिरण्यकश्यपु जैसे महान राक्षस के भय से और अपने प्रिय भक्त प्रह्लाद की रक्षा करने भगवान् नरसिंह खम्भे से प्रकट हुए।  हिरण्यकशिपु को भगवान ब्रह्मा से विशेष वरदान प्राप्त था कि वह किसी मनुष्य, देवता, पशु या किसी अन्य प्राणी द्वारा नहीं मारा जा सकता था।  उसे न तो दिन में और न ही रात में किसी भी तरह के हथियार से मारा जा सकता था। तो, भगवान आधे मनुष्य, आधे शेर के रूप में प्रकट हुए और सभी शर्तों को पूरा करते हुए गोधूलि के समय हिरण्यकशिपु को अपने नाखूनों से म...

महाभारत का असली विलेन कौन?

वैसे भगवद गीता को हमारा पुरातन और सनातन वैदिक ग्रन्थ माना जाता है, जो भगवान् ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को सुनाई। भगवद गीता में मुख्य रूप से चार पात्र स्वयं भगवान् श्री कृष्ण, अर्जुन, संजय और धृतराष्ट है, पर प्रश्न यह उठता है कि गीता में इतने पात्र होते हुए भी गीता धृतराष्ट से ही क्यों शुरू हुई? वास्तव में यदि हम महाभारत की पृस्ठभूमि देखें तो हम समझ पाएंगे कि धृतराष्ट सक्रीय रूप से खलनायक नहीं है पर वे अपने ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन की आड़ में सम्पूर्ण संपत्ति को हड़पना चाहते थे।  धृतराष्ट का अर्थ ही धृत अर्थात धारण करना और राष्ट्र अर्थात सम्पूर्ण राज्य, जो सम्पूर्ण राज्य को अकेले ही धारण करना चाहता है और वह किसी भी प्रकार से फिर चाहे पांडवों को जहर देकर मारने की योजना बनाकर, लाख्यागृह में आग लगाकर या छल द्वारा जुएं में हराकर भरी सभा में द्रौपदी को निर्वस्त्र करना। वास्तव में दुर्योधन जन्म से ही आसुरी स्वाभाव वाला था, इसीलिए धृतराष्ट के छोटे भाई महाराज विदुर धृतराष्ट को जाकर कहते हैं कि यह पुत्र बड़े ही अपशगुन के साथ जन्म लिया है और इसके लक्षण सम्पूर्ण कौरवों के विनाश को सूचित करता है, बे...