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७५वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं !

आप सभी को ७५वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।  आज हमें गर्व होना चाहिए की हमने भारत भूमि पर जन्म पाया है और जो भी इस पावन भूमि पर जन्म लेता है वह कही न कही पवित्र आत्मा होता है और इसी कारण श्री चैतन्य महाप्रभु जो कलियुग में स्वयं श्री कृष्ण के अवतार रूप में प्रकट हुए, कहा है (चैतन्य चरितामृत); भारत भूमि ते होइलो मनुष्य जन्म जार।  जन्म सार्थक करि, कर पर उपकार।। अर्थात जो भी मनुष्य भारत भूमि पर जन्म लेता है उसकी बहुत बड़ी जिम्मेदारी है कि वह दूसरों के प्रति उपकार करें और वह उपकार क्या है? जो भी हमारे वैदिक काल से चली आ रही परंपरा है उसको बचा कर रखे और दूसरों को भी उसकी शिक्षा प्रदान करें।  आज इस विज्ञान और तकनिकी के आधुनिक युग में हम कही न कही अपनी संस्कृति ,शिष्टाचार , संवेदना, प्रेम, समपर्ण , उदारता और सेवा की भावना को खोते जा रहे हैं और पाश्चात्य जगत की शैली को हम अपना रहे हैं। जिसके कारण न केवल हम एकाकी बल्कि तनावपूर्ण जीवन जी रहे हैं जबकि आज वह सब कुछ है जो शायद हमें पहले प्राप्त नहीं था।  पूर्व काल से ही भारत को सोने की चिड़ियाँ कहा जाता है और वह वास्तविक में...

श्रीमद्भगवद्गीता जयंती २०२३

गीता जयंती आगामी २३ दिसंबर २०२३  श्रीमद्भगवद्गीता के अवतरण का शुभ दिन है। आज के दिन ही भगवान श्री कृष्ण ने आज से लगभग ५ हजार वर्ष पूर्व अर्जुन को वैदिक ज्ञान का सार प्रदान किया था और उन्हें जीवन के अंतिम लक्ष्य के बारे में बताया था। गीता माहात्म्य में आदि गुरु शंकराचार्य ने स्पष्ट रूप से बताया है;  गीता शास्त्रं इदं पुण्यं यः पठेत् प्रयतः पुमान् । विष्णोः पादं अवाप्नोति भय शोकादि वर्जितः ।। भगवद्गीता दिव्य साहित्य है। जो इसे ध्यानपूर्वक पढ़ता है और इसके उपदेशों का पालन करता है, वह भगवान् विष्णु का आश्रय प्राप्त करता है जो कि समस्त भय तथा चिंताओं से मुक्त है। इस्कॉन संस्थापक-आचार्य, श्रील प्रभुपाद ने भगवद गीता को एक विद्वतापूर्ण लेकिन सरल भाषा में प्रस्तुत किया है और इसे न केवल भारत में अपितु विश्व के सभी राष्ट्रों में इसे प्रचारित किया । यह दुनिया में गीता का सबसे अधिक बिकने वाला संस्करण है। श्रील प्रभुपाद ने इस अतुलनीय उपहार को सभी को वितरित करने पर भी जोर दिया है, यहाँ तक हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी भी इस दिव्य साहित्य को सभी देशों में उपहार स्वरूप  दे...

जीवन में एक लक्ष्य होना अत्यंत आवश्यक

एक कहावत है जिसने अपने जीवन के लक्ष्य को नहीं समझा उसने अपने जीवन को ही नहीं समझा, लक्ष्य विहिन जीवन पशु तुल्य होता है और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है एक लक्ष्य पर बने रहना।  भगवान श्री कृष्ण भगवद गीता के दूसरे अध्याय के ४१ वें श्लोक में बताते हैं, व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरूनन्दन । बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ 2.41 ॥ जो लोग इस मार्ग पर हैं वे उद्देश्य में दृढ़ हैं, और उनका लक्ष्य एक है। हे कौरवों के प्रिय पुत्र, जो लोग दृढ़ नहीं हैं उनकी बुद्धि अनेक शाखाओं वाली होती है। यदि व्यक्ति सही तरीके से अपने लक्ष्य के प्रति गंभीर हो और सही मार्गदर्शन में आगे बढ़ता रहे तो वह अपनी रास्तों में आने वाले छोटी -छोटी बांधाओं के प्रति इतना गंभीर नहीं रहता, यहाँ तक वह अपनी मुलभुत आवश्यकताओं जैसे आहार, निद्रा, भय और मैथुन जैसे कार्यों से भी विचलित नहीं होता।  एक बार जब गुरु द्रोणाचार्य ने अपने सभी शिष्यों से एक पेड़ पर बैठी चिड़िया की आँख में निशाना लगाने के लिए कहा तब सभी शिष्यों से उन्होंने बारी  - बारी से पूछा। दुर्योधन ने पेड़ और उस पर बैठी चिड़िया के बारे में बताया, महाराज ...

धनतेरस और दीपावली की ढेर सारी हार्दिक शुभकामनायें

दीपावली का त्यौहार हमारे देश में बड़े ही उत्सव के साथ मनाया जाता है और यह त्यौहार आज के दिन अर्थात धनतेरस से शुरू होकर पांच दिन तक चलता है।  वैसे ज्यादातर लोग धनतेरस को धन की देवी अर्थात श्री लक्ष्मी देवी की कृपा के लिए ही उनकी पूजा करते हैं पर शायद लोंगो को यह नहीं पता की उस दिन धनवंतरी अर्थात आयुर्वेद के मूर्तिमान स्वरुप स्वयं भगवान् नारायण का प्राकट्य हुआ।  भगवान् धनवंतरी का प्राकट्य समुद्र मंथन से करोडो वर्ष पूर्व हुआ और उन्होंने सम्पूर्ण विश्व को आयुर्वेद विज्ञान का ज्ञान प्रदान किया।  भगवान् धनवंतरी का स्वरुप पितांबर धारण किए एक हाँथ में आयुर्वेद का भंडार लिए सभी को स्वास्थ्य और कल्याण प्रदान करने की मुद्रा में प्रकट हुए।  धनतेरस के दिन,  सम्पूर्ण  भारत में, शाम के समय, भगवान धन्वंतरि के स्वागत के लिए घर के दरवाजे पर उत्तर-पूर्व की ओर दीपक जलाया जाता है। भक्त इस दिन जीवन में अच्छे स्वास्थ्य, समृद्धि और खुशी के लिए भगवान का आशीर्वाद मांगते हैं। भगवान धन्वंतरि नकारात्मकता को नष्ट करते हैं और अपने भक्तों को सभी शुभ आशीर्वाद प्रदान करते हैं। धनतेरस के दो द...

श्री श्री राधागिरिधारी ब्रह्मोत्सव

आज बहुत ही पावन दिवस है तिथि अनुसार आज के दिन ही श्री श्री राधा गिरिधारी, श्री श्री जगन्नाथ, बलदेव, सुभद्रा मैया एवं सुदर्शन, श्री श्री गौर - निताई एवं श्री श्री नरसिम्ह देव एवं प्रह्लाद महाराज को इस्कान मिरा रोड स्थित मंदिर में  विग्रह के रूप में स्थापित किया गया।  वर्ष २०१६ के श्रावण मॉस के शुक्ल पक्ष के वामन द्वादशी के शुभ दिन श्री श्री राधा गिरिधारी मंदिर का उद्घाटन किया गया।  इतिहास के रूप में देखने जाए तो श्री श्री राधा गिरिधारी स्वयं अपनी अद्भुत लीला से वहां प्रकट हुए और स्वयं विशाल मंदिर का निर्माण भक्तों के द्वारा करवाए। श्री श्री राधा गिरिधारी मंदिर की एक विशेषता यह भी है, कि जो भी भक्त सच्चे मन से उनसे प्रार्थना करता है उनकी वे सभी इच्छाएं पूरी कर देते हैं।  ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार हमारे मन में अरविन्द प्रभुजी और हम दोनों मिलकर कुछ समाज कल्याण का कार्य करना चाहते थे और इसके लिए हम सभी बहुत प्रयास रत रहते थे।  और एक दिन जब हमें अरविन्द प्रभू ने बताया की श्रीमान कमल लोचन प्रभुजी द्वारा जो की मंदिर के अध्यक्ष रूप में कार्यरत हैं श्री रामायण का प्रवचन क...

श्री श्री राधा अष्टमी - श्रीमती राधारानी का प्राकट्य दिवस

जब राधा और कृष्ण की बात आती है तब सांसारिक दृश्टिकोण से सभी के मन में एक ही प्रश्न उठता है, यदि राधा और कृष्ण प्रेम कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं ? व्यावहारिक दृष्टि से हम सभी को यही लगता है कि जो प्रेम स्त्री और पुरुष इस संसार में करते हैं वही प्रेम राधा और कृष्ण ने किया, पर कभी हमने यह जानने की कोशिश नहीं करते कि इसके पीछे की वास्तविकता क्या है ? जिस सांसारिक स्त्री-पुरुष प्रेम के लिए हमारा समाज स्वयं विरोध करता आया है फिर चाहे वे लैला-मजनू या रोमियो- जूलिएट हो फिर कैसे वही समाज राधा - कृष्ण के इस अनैतिक प्रेम को इतना दिव्य मानेगा? वास्तव में इस संसार में वास्तविक प्रेम है ही नहीं, वो तो बस काम है जो स्त्री-पुरुष को एक-दूसरे को बाँध के रखता है।  वास्तविक प्रेम तो राधा और कृष्ण ने किया जिसकी महानता को हम आज भी स्वीकार करते हैं।  श्रीमती राधारानी कोई साधारण स्त्री नहीं है अपितु स्वयं भगवान श्री कृष्ण की आह्लादिनी शक्ति हैं और उनमें और कृष्ण में कोई अंतर् नहीं है, वे दो शरीर और एक प्राण हैं।  श्रीमती राधारानी के प्राकट्य का इतिहास अगर हम देखें तो सब कुछ स्पष्ट हो जायेगा कि ...

भावग्राही जनार्दन

 भगवान श्री कृष्ण वास्तव में भावग्राही हैं, यदि हम हृदय पूर्वक उन्हें श्रद्धा भाव से कुछ अर्पित करते हैं तो निश्चित रूप से वे उसे स्वीकार करते हैं फिर चाहे वह पत्ता, पुष्प, फल अथवा जल ही क्यों न हो।  श्रीमद भगवद्गीता में इसकी पुष्टि भगवान् श्री कृष्ण स्वयं करते हैं ९वे अध्याय के २६ वे श्लोक।  पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।।९. २६।। इसके उदाहरण भी हमें शास्त्र में प्राप्त होते हैं, वास्तव में ये सभी वस्तुएं बहुत ही आसानी से और बिना मूल्य के सभी स्थानों पर उपलब्ध है और कोई भी इनको प्राप्त कर सकता हैं।  पत्ता - इस सन्दर्भ में हम देखे तो भगवान् की एक लीला जो द्वारका में रुक्मिणी देवी और सत्यभामा के बीच संपन्न हुयी थी, सत्यभामा ने भगवान् श्री कृष्ण के बराबर तुला दान करने का समझौता किया था पर सब कुछ एक सिरे पर रख देने के बाद भी तूले का दूसरा सिरा हिला तक नहीं।  फिर तुलसी का एक दल रखने मात्र से भगवान् का सिरा उठ गया।  पुष्प - श्रीमद भागवतम में गजेंद्र हांथी की कथा आती है, कैसे गजेंद्र और मगर का युद्ध हजार वर्षो त...