Skip to main content

Posts

दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएँ

हमारा देश भारत सांस्कृतिक पर्वों का देश मना जाता है।  यहाँ पर न केवल विविध प्रकार के पर्व मनाये जाते है बल्कि उन पर्वों के पीछे कुछ न कुछ सामाजिक , पारम्परिक, सांसारिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक कारण भी हैं।  पर आज शायद हम उन्हें जाने सुने बिना बस केवल एक प्रकार से अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए सभी त्योहारों को मना रहे हैं , जो न केवल समाज को गुमराह कर रहा हैं अपितु हमारी अपनी आस्था को भी ठेस पहुंचाता है।  बिना प्रमाणिकता के बस अपनी सनक वश किसी कार्य को करना यह केवल एक रजोगुण का प्रभाव है, और इस कारन व्यक्ति अपनी संस्कृति, धर्म और आस्था को एक तरफ रखकर केवल दिखावेबाजी में त्योहारों को मना रहा है।  आइये हम सभी दिवाली पर्व के इन सभी पहलुओं पर एक छोटी सी झलक डालते हैं जिससे हमने पता चले कि आखिर हम यह त्यौहार मनाते क्यों हैं ? पारम्परिक कारण : चूँकि हम सभी भारत भूमि में जन्म प्राप्त किये है इसलिए हमारा यह परम सौभाग्य है कि हमें बचपन से परम्परागत तरीके से इन सभी त्योहारों की छवि बचपन से मिलती आ रही हैं।  सामाजिक कारण : हमारी देश की बहुत ही अच्छी बात जो विविधता में एकता देखन...

जय गुरुदेव -गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं

गुरु शब्द संस्कृत के गु तथा रु की संधि है जिसका अर्थ है अंधकार से प्रकाश की ओर। गुरु हमें अंधकार अर्थात अज्ञानता से प्रकाश अर्थात ज्ञान के मार्ग पर ले आते हैं।  गुरु का एक और अर्थ होता है जिसका मतलब बहुत ही भारी, वास्तव में गुरु शब्द की सही- सही व्याख्या कर पाना बहुत दुर्लभ है। पर गुरु इतने दयालु एव्ं कृपालु होते हैं कि हम जैसे पतितो के उद्धार हेतु इस दुःख भरे संसार में आते हैं और हमें इस भव सागर से निकालकर अध्यात्मिक मार्ग पर ले कर आते हैं।  सही मायने में हम गुरु के ऋण से कभी भी मुक्त नही हो सकते हैं, पर यदि हम गुरु के बताए गए मार्ग पर दृढ़ता पूर्वक चलते हैं तो गुरु सदैव हमारे ऊपर अपनी कृपा बनाए रखते हैं।  गुरु वासत्व में भगवान् का प्रतिनिधि होते हैं, और उन्हे भगवान् से कम नही समझना चाहिए। शास्त्रों में तो यहाँ तक कहा गया है कि जो गाय को पशु, भगवान् के विग्रह को मूर्ति, और गुरु को साधारण व्यक्ति समझता है वह घोर नरक गामी होता है।  आइए हम सभी इस गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर पर अपने- अपने गुरुदेव के चरणों में प्रार्थना करें जिससे वे सदैव हमारा मार्गदर्शन करें और हमें तमोग...

महावीर हनुमान मंदीर प्राण प्रतिष्ठा समारोह

 हरे कृष्ण,  आप सभी को सूचित करते हुए अत्यंत हर्ष का अनुभव हो रहा है कि ग्राम पंचायत छातीडीह में अत्यंत प्राचीन महावीर मंदीर का जीर्णोद्धार एवं नवीन मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा का भव्य कार्य वसंत पंचमी के पावन अवसर पर संपन्न हुआ।  यह मंदीर विगत 40 वर्षों से अधिक समय से जरजर अवस्था में थी, जिसमें विरलै ही कोई पूजा के लिए जाता था, लेकिन काफी समय बाद आज उस मंदीर की काया कल्प हो रही है।  इस कार्य में युवा पीढ़ी का योगदान अत्यंत महान है, आज कहीं न कहीं युवा पीढ़ी नशा, व्यभिचार, जुए और मांसाहार का शिकार होकर अपने आप को गर्त में गिराते हुए नास्तिकता की ओर बढ़ रहे हैं, पर इसी युग में इस प्रकार के अद्भुत एवं सराहनिय कार्य को होता हुआ देख सभी अचंभित हैं. आज ऐसे युवाओं की अत्यंत आवश्यकता है जो अपने धर्म और कर्तव्य के प्रति जागरूक हों, और इस कार्य में बड़ों के योगदान की भी अत्यंत आवश्यकता है,  क्योंकि भगवान भी भगवत गीता में कहते हैं, जैसे बड़े आचरण करते हैं वैसे ही छोटे भविष्य में करेंगे। यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।3.21।। इस अद्भुत ...

गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं !

प्रायः ऐसा कहा जाता है कि किसी भी क्षेत्र में यदि आपको कुछ सीखना है तो आपको गुरु रूप में किसी न किसी को स्वीकार करना होता है पर उनका स्तर भौतिक है, फिर यदि हम आध्यात्म की बात करें तो निश्चित रूप से हमें गुरु स्वीकार करना ही पड़ेगा।  क्योंकि बिना गुरु के हमें भौतिक ज्ञान तो एक बार कदाचित हो भी सकता है पर आध्यात्मिक ज्ञान बिलकुल संभव नहीं, इन्ही कारणों से हम देखते हैं की भगवान श्री राम एवं श्री कृष्ण ने भी गुरु को  स्वीकार किया।  इतना ही नही सृष्टि के निर्माता ब्रह्माजी को भी गुरु की आवश्यकता पड़ी श्रीमद भागवतम के दूसरे स्कन्द के दूसरे अध्याय के ३३ से ३६ श्लोक में जब ब्रह्माजी भगवान श्री कृष्ण द्वारा ज्ञान प्राप्त करते हैं तब जाकर कहीं वे सृष्टि का निर्माण कार्य करते हैं।  गुरु बनाना कोई फैशन की बात नहीं बल्कि उनके प्रति पूर्ण रूप से समपर्ण होना जरुरी है, क्योंकि गुरु कोई साधारण व्यक्ति नहीं अपितु स्वयं भगवान् श्री कृष्ण के प्रतिनिधि है और पतित जीवों का उद्धार करने जो की संसार के माया में पड़े होकर त्रिविध कष्टों को भोग रहे हैं उन्हें मुक्ति दिलाने आते हैं।  ॐ अज्ञान...

वैदिक जीवन शैली बनाम आधुनिक जीवन शैली - भाग २

 इसमें कोई  संदेह नहीं की अब हम वापस वैदिक जीवन शैली को शायद अपना पाए क्योंकि अब हम आध्यात्मिक और पारम्परिक भारतीय जीवन शैली से  इतने दूर आ चुके हैं की अब हमें इसे अपनाने में शर्मिंदगी महसूस होती है ।  अतः अब यह कहना बेकार है की हमें पुनः भारतीय परम्परागत जीवन शैली अपनाना चाहिए या सच कहा जाय तो शायद यह संभव भी न होगा, परन्तु एक बात तो हमें यह भी स्वीकारनी होगी कि आधुनिक जीवन शैली से भी हमारा किसी प्रकार से कल्याण नहीं होने वाला है।  तो क्यों न दोनों में परस्पर सामंजस्य बिठाया जाय और आधुनिक जीवन शैली बिताने के साथ  - साथ हम थोड़े आध्यात्मिक जीवन को भी अपनाये जिससे हम स्वयं अपने आप को और आने वाली पीढ़ी को पतन से बचा पाए। क्योंकि स्वयं भगवान् श्री कृष्ण इस बात की पुष्टि करते हैं, कि यदि कोई थोड़ा भी आध्यात्मिक (भक्तिमार्ग) को अपनाता है तो उसे बड़े से बड़े संकटो से रक्षा हो सकती है और इसमें हमारा कोई नुकसान भी नहीं ।  नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥ 2.40 ॥ इसीलिए भक्तिवेदांत स्वामी श्रील प्रभुपाद ने हमें केव...

महाशिवरात्रि की ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएं

महाशिवरात्रि की ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएं । श्रीमद् भागवत में शिव जी का वर्णन आता है किस प्रकार शिवजी एक महान वैश्णव के रूप में भगवान के निरंतर ध्यान में लगे रहते हैं।  वैसे तो शिवजी को आशुतोष के नाम से जाना जाता है जिसका अर्थ होता है शीघ्र ही प्रसन्न हो जाना ।  वास्तव में शिवजी सबसे प्रसन्न रहते हैं तभी तो वह भूत गण आदी को भी अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करते हैं।  शिवजी अपने आचरण से हमें यह दिखाते हैं यह किस प्रकार से एक व्यक्ति को अपना जीवन जीना चाहिए न केवल भौतिक उपलब्धि बल्कि त्याग वैराग्य तपस्या साधना सभी के मेल जोल हम शिवजी में देखते हैं।  दक्ष प्रजापति के प्रसंग में भी हम देखते हैं की किस प्रकार से माता सती के जब शरीर का त्याग हो जाता है उसके पश्चात शिवजी दक्ष प्रजापति का वध कर देते हैं और ब्रह्मा जी के आने के पश्चात जब उन्हें समझाते हैं तब शिवजी तुरंत ही दक्ष प्रजापति को क्षमा कर देते हैं और उन्हे जीवित कर देते हैं।  हमारे जीवन में शिवजी अपने आचरण से हमें सिखाते हैं कि किस प्रकार से भगवत भक्ति ही एकमात्र हमारा उद्देश्य होना चाहिए जो मनुष्य जीवन को सा...

वैदिक जीवन शैली बनाम आधुनिक जीवन शैली

किसी दार्शनिक ने कही न कही बहुत ही सुंदर और कटु सत्य कहा था, यदि गाँव बर्बाद हुए , भारत भी बर्बाद हो जायेगा।  भारत फिर अपनी वास्तविक छवि को खो बैठेगा।  वास्तव में हमारे गांव में वैदिक पद्धति से जीवन जिया जाता था पर शायद अब वह बात गाँव में नहीं रह गयी।  कहने को तो गाँव अब भी है , आज भी मुर्गा सुबह बांग देता है , ठंडी और ताजी हवा आज भी बहती है, प्रदूषण शहरों की तुलना में आज भी गाँव में बहुत कम पाया जाता है ।  किन्तु अब वह भावना नहीं रह गयी, अब गाँव नरक बन चुका है। असली भारत बहुत ही गहरी नीद में सो रहा है। हमारे हृदय से दूसरों के प्रति प्रेम और सद्भावना कोशो दूर चली गयी है। दूसरों पर यहाँ तक की अब परिवार के सदस्यों पर भी विश्वास करना दुर्लभ है जबकि वैदिक काल में लोग दुश्मनों पर भी विश्वास करते थे। राजनिति जिससे हमारा दूर - दूर तक सम्बन्ध नहीं था, आज हर जगह बीमारी की तरह फ़ैल गयी है। गाँव का जीवन अब ईर्ष्या और द्वेष से भर चुका है,  जबकि पहले व्यक्ति जब तक उसका पडोसी भोजन नहीं कर लेता वह स्वयं भोजन नहीं करता और यदि वह भूखा सो रहा है तो पडोसी उसे अपने हिस्से का खि...

७५वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं !

आप सभी को ७५वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।  आज हमें गर्व होना चाहिए की हमने भारत भूमि पर जन्म पाया है और जो भी इस पावन भूमि पर जन्म लेता है वह कही न कही पवित्र आत्मा होता है और इसी कारण श्री चैतन्य महाप्रभु जो कलियुग में स्वयं श्री कृष्ण के अवतार रूप में प्रकट हुए, कहा है (चैतन्य चरितामृत); भारत भूमि ते होइलो मनुष्य जन्म जार।  जन्म सार्थक करि, कर पर उपकार।। अर्थात जो भी मनुष्य भारत भूमि पर जन्म लेता है उसकी बहुत बड़ी जिम्मेदारी है कि वह दूसरों के प्रति उपकार करें और वह उपकार क्या है? जो भी हमारे वैदिक काल से चली आ रही परंपरा है उसको बचा कर रखे और दूसरों को भी उसकी शिक्षा प्रदान करें।  आज इस विज्ञान और तकनिकी के आधुनिक युग में हम कही न कही अपनी संस्कृति ,शिष्टाचार , संवेदना, प्रेम, समपर्ण , उदारता और सेवा की भावना को खोते जा रहे हैं और पाश्चात्य जगत की शैली को हम अपना रहे हैं। जिसके कारण न केवल हम एकाकी बल्कि तनावपूर्ण जीवन जी रहे हैं जबकि आज वह सब कुछ है जो शायद हमें पहले प्राप्त नहीं था।  पूर्व काल से ही भारत को सोने की चिड़ियाँ कहा जाता है और वह वास्तविक में...

श्रीमद्भगवद्गीता जयंती २०२३

गीता जयंती आगामी २३ दिसंबर २०२३  श्रीमद्भगवद्गीता के अवतरण का शुभ दिन है। आज के दिन ही भगवान श्री कृष्ण ने आज से लगभग ५ हजार वर्ष पूर्व अर्जुन को वैदिक ज्ञान का सार प्रदान किया था और उन्हें जीवन के अंतिम लक्ष्य के बारे में बताया था। गीता माहात्म्य में आदि गुरु शंकराचार्य ने स्पष्ट रूप से बताया है;  गीता शास्त्रं इदं पुण्यं यः पठेत् प्रयतः पुमान् । विष्णोः पादं अवाप्नोति भय शोकादि वर्जितः ।। भगवद्गीता दिव्य साहित्य है। जो इसे ध्यानपूर्वक पढ़ता है और इसके उपदेशों का पालन करता है, वह भगवान् विष्णु का आश्रय प्राप्त करता है जो कि समस्त भय तथा चिंताओं से मुक्त है। इस्कॉन संस्थापक-आचार्य, श्रील प्रभुपाद ने भगवद गीता को एक विद्वतापूर्ण लेकिन सरल भाषा में प्रस्तुत किया है और इसे न केवल भारत में अपितु विश्व के सभी राष्ट्रों में इसे प्रचारित किया । यह दुनिया में गीता का सबसे अधिक बिकने वाला संस्करण है। श्रील प्रभुपाद ने इस अतुलनीय उपहार को सभी को वितरित करने पर भी जोर दिया है, यहाँ तक हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी भी इस दिव्य साहित्य को सभी देशों में उपहार स्वरूप  दे...

जीवन में एक लक्ष्य होना अत्यंत आवश्यक

एक कहावत है जिसने अपने जीवन के लक्ष्य को नहीं समझा उसने अपने जीवन को ही नहीं समझा, लक्ष्य विहिन जीवन पशु तुल्य होता है और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है एक लक्ष्य पर बने रहना।  भगवान श्री कृष्ण भगवद गीता के दूसरे अध्याय के ४१ वें श्लोक में बताते हैं, व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरूनन्दन । बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ 2.41 ॥ जो लोग इस मार्ग पर हैं वे उद्देश्य में दृढ़ हैं, और उनका लक्ष्य एक है। हे कौरवों के प्रिय पुत्र, जो लोग दृढ़ नहीं हैं उनकी बुद्धि अनेक शाखाओं वाली होती है। यदि व्यक्ति सही तरीके से अपने लक्ष्य के प्रति गंभीर हो और सही मार्गदर्शन में आगे बढ़ता रहे तो वह अपनी रास्तों में आने वाले छोटी -छोटी बांधाओं के प्रति इतना गंभीर नहीं रहता, यहाँ तक वह अपनी मुलभुत आवश्यकताओं जैसे आहार, निद्रा, भय और मैथुन जैसे कार्यों से भी विचलित नहीं होता।  एक बार जब गुरु द्रोणाचार्य ने अपने सभी शिष्यों से एक पेड़ पर बैठी चिड़िया की आँख में निशाना लगाने के लिए कहा तब सभी शिष्यों से उन्होंने बारी  - बारी से पूछा। दुर्योधन ने पेड़ और उस पर बैठी चिड़िया के बारे में बताया, महाराज ...

धनतेरस और दीपावली की ढेर सारी हार्दिक शुभकामनायें

दीपावली का त्यौहार हमारे देश में बड़े ही उत्सव के साथ मनाया जाता है और यह त्यौहार आज के दिन अर्थात धनतेरस से शुरू होकर पांच दिन तक चलता है।  वैसे ज्यादातर लोग धनतेरस को धन की देवी अर्थात श्री लक्ष्मी देवी की कृपा के लिए ही उनकी पूजा करते हैं पर शायद लोंगो को यह नहीं पता की उस दिन धनवंतरी अर्थात आयुर्वेद के मूर्तिमान स्वरुप स्वयं भगवान् नारायण का प्राकट्य हुआ।  भगवान् धनवंतरी का प्राकट्य समुद्र मंथन से करोडो वर्ष पूर्व हुआ और उन्होंने सम्पूर्ण विश्व को आयुर्वेद विज्ञान का ज्ञान प्रदान किया।  भगवान् धनवंतरी का स्वरुप पितांबर धारण किए एक हाँथ में आयुर्वेद का भंडार लिए सभी को स्वास्थ्य और कल्याण प्रदान करने की मुद्रा में प्रकट हुए।  धनतेरस के दिन,  सम्पूर्ण  भारत में, शाम के समय, भगवान धन्वंतरि के स्वागत के लिए घर के दरवाजे पर उत्तर-पूर्व की ओर दीपक जलाया जाता है। भक्त इस दिन जीवन में अच्छे स्वास्थ्य, समृद्धि और खुशी के लिए भगवान का आशीर्वाद मांगते हैं। भगवान धन्वंतरि नकारात्मकता को नष्ट करते हैं और अपने भक्तों को सभी शुभ आशीर्वाद प्रदान करते हैं। धनतेरस के दो द...

श्री श्री राधागिरिधारी ब्रह्मोत्सव

आज बहुत ही पावन दिवस है तिथि अनुसार आज के दिन ही श्री श्री राधा गिरिधारी, श्री श्री जगन्नाथ, बलदेव, सुभद्रा मैया एवं सुदर्शन, श्री श्री गौर - निताई एवं श्री श्री नरसिम्ह देव एवं प्रह्लाद महाराज को इस्कान मिरा रोड स्थित मंदिर में  विग्रह के रूप में स्थापित किया गया।  वर्ष २०१६ के श्रावण मॉस के शुक्ल पक्ष के वामन द्वादशी के शुभ दिन श्री श्री राधा गिरिधारी मंदिर का उद्घाटन किया गया।  इतिहास के रूप में देखने जाए तो श्री श्री राधा गिरिधारी स्वयं अपनी अद्भुत लीला से वहां प्रकट हुए और स्वयं विशाल मंदिर का निर्माण भक्तों के द्वारा करवाए। श्री श्री राधा गिरिधारी मंदिर की एक विशेषता यह भी है, कि जो भी भक्त सच्चे मन से उनसे प्रार्थना करता है उनकी वे सभी इच्छाएं पूरी कर देते हैं।  ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार हमारे मन में अरविन्द प्रभुजी और हम दोनों मिलकर कुछ समाज कल्याण का कार्य करना चाहते थे और इसके लिए हम सभी बहुत प्रयास रत रहते थे।  और एक दिन जब हमें अरविन्द प्रभू ने बताया की श्रीमान कमल लोचन प्रभुजी द्वारा जो की मंदिर के अध्यक्ष रूप में कार्यरत हैं श्री रामायण का प्रवचन क...

श्री श्री राधा अष्टमी - श्रीमती राधारानी का प्राकट्य दिवस

जब राधा और कृष्ण की बात आती है तब सांसारिक दृश्टिकोण से सभी के मन में एक ही प्रश्न उठता है, यदि राधा और कृष्ण प्रेम कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं ? व्यावहारिक दृष्टि से हम सभी को यही लगता है कि जो प्रेम स्त्री और पुरुष इस संसार में करते हैं वही प्रेम राधा और कृष्ण ने किया, पर कभी हमने यह जानने की कोशिश नहीं करते कि इसके पीछे की वास्तविकता क्या है ? जिस सांसारिक स्त्री-पुरुष प्रेम के लिए हमारा समाज स्वयं विरोध करता आया है फिर चाहे वे लैला-मजनू या रोमियो- जूलिएट हो फिर कैसे वही समाज राधा - कृष्ण के इस अनैतिक प्रेम को इतना दिव्य मानेगा? वास्तव में इस संसार में वास्तविक प्रेम है ही नहीं, वो तो बस काम है जो स्त्री-पुरुष को एक-दूसरे को बाँध के रखता है।  वास्तविक प्रेम तो राधा और कृष्ण ने किया जिसकी महानता को हम आज भी स्वीकार करते हैं।  श्रीमती राधारानी कोई साधारण स्त्री नहीं है अपितु स्वयं भगवान श्री कृष्ण की आह्लादिनी शक्ति हैं और उनमें और कृष्ण में कोई अंतर् नहीं है, वे दो शरीर और एक प्राण हैं।  श्रीमती राधारानी के प्राकट्य का इतिहास अगर हम देखें तो सब कुछ स्पष्ट हो जायेगा कि ...

भावग्राही जनार्दन

 भगवान श्री कृष्ण वास्तव में भावग्राही हैं, यदि हम हृदय पूर्वक उन्हें श्रद्धा भाव से कुछ अर्पित करते हैं तो निश्चित रूप से वे उसे स्वीकार करते हैं फिर चाहे वह पत्ता, पुष्प, फल अथवा जल ही क्यों न हो।  श्रीमद भगवद्गीता में इसकी पुष्टि भगवान् श्री कृष्ण स्वयं करते हैं ९वे अध्याय के २६ वे श्लोक।  पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।।९. २६।। इसके उदाहरण भी हमें शास्त्र में प्राप्त होते हैं, वास्तव में ये सभी वस्तुएं बहुत ही आसानी से और बिना मूल्य के सभी स्थानों पर उपलब्ध है और कोई भी इनको प्राप्त कर सकता हैं।  पत्ता - इस सन्दर्भ में हम देखे तो भगवान् की एक लीला जो द्वारका में रुक्मिणी देवी और सत्यभामा के बीच संपन्न हुयी थी, सत्यभामा ने भगवान् श्री कृष्ण के बराबर तुला दान करने का समझौता किया था पर सब कुछ एक सिरे पर रख देने के बाद भी तूले का दूसरा सिरा हिला तक नहीं।  फिर तुलसी का एक दल रखने मात्र से भगवान् का सिरा उठ गया।  पुष्प - श्रीमद भागवतम में गजेंद्र हांथी की कथा आती है, कैसे गजेंद्र और मगर का युद्ध हजार वर्षो त...

भगवत चेतना का बच्चों पर प्रभाव

श्रीमद भागवतम के चतुर्थ स्कन्द के १२वें अध्याय के २३वें श्लोक में वर्णन आता है, कि किस प्रकार महाराज ध्रुव अपनी पांच वर्ष की आयु में ही भगवत चेतना विकसित कर लेते है और न केवल भौतिक जगत में ३६ हजार वर्ष सुख भोग करते हैं अपितु उन्हें सबसे उच्च लोक आध्यात्मिक जगत में भी ध्रुव लोक भेज दिया जाता हैं।  और ऐसा इसलिए होता हैं क्योंकि उन्होंने बचपन से ही भगवान् की भक्ति शुरू कर दी और उन्हें भगवान् नारायण के दर्शन भी प्राप्त होते हैं, उन्होंने अपनी इन्द्रियों और मन पर पूर्ण रूप से नियत्रण कर केवल भगवान् के नाम, रूप, गुण और लीलाओं पर अपना ध्यान केंद्रित किया जिससे उनके ह्रदय में स्थित परमात्मा ने उन्हें साक्षात् दर्शन दिए और उनका जीवन सफल बना।  ध्रुव महाराज की तरह किसी भी पांच वर्ष के बालक को शिक्षित किया जा सकता है और कुछ ही काल में उसे कृष्ण चेतना का बोध हो सकता है और इस प्रकार वह अपना जीवन सफल बना सकता है।  पर दुर्भाग्यवश ऐसी शिक्षा का विश्व भर में आभाव है, हमारे आधुनिक सामाज में बड़े - बड़े स्कूल और कालेज तो हैं पर किसी भी संसथान में बच्चों तथा युवको को भगवत चेतना का पाठ नहीं पढ़ाय...

भगवत गीता पढ़ने, पढाने और सुनने का लाभ

आदि शंकराचार्य जी के मतानुसार एक ही शास्त्र होना चाहिए और वह केवल भगवद गीता और एक ही भगवान होने चाहिए केवल भगवान् श्री कृष्ण। भगवत गीता कोई धार्मिक या सामुदायिक ग्रन्थ नहीं है अपितु यह इन सबसे ऊपर एक आध्यात्मिक योग पद्धति प्रदान करने वाला ग्रन्थ है, जिससे हर व्यक्ति अपने आप को ज्ञान योग, कर्म योग तथा भक्ति योग के माध्यम से सही तरीके से जाने और अपनी असली पहचान के द्वारा वह सही कार्य को करने की प्रेरणा ले।  भगवत गीता का मुख्य उद्देश्य हमें अज्ञानता के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश में लाना है, और जैसे ही हम ज्ञान में स्थित हो जाते हैं हम अपने हर कार्य के लिए सही निर्णय ले सकने में सक्षम हो सकेंगे।  आज हर व्यक्ति निणर्य लेने में या तो भ्रमित रहता है, या मनमाने  ढंग से निर्णय लेता है जिससे भविष्य में उसे पछताना पड़ता है, पर यदि व्यक्ति भगवद गीता का आश्रय लेता है तो उसे सही बुद्धि के कारण सही निर्णय लेने में आसानी हो जाती है।  भगवत गीता की शिक्षा सभी वर्गों के लिए है फिर चाहे कोई  शिक्षक है, विद्यार्थी है, व्यापारी है उससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि कहीं न कहीं हर...

जय-जय विट्ठल श्री हरी विट्ठल पांडुरंगा गोविंदा !

महाराष्ट्र प्रदेश में भगवान् श्री कृष्ण के अनन्य भक्त हुए, जिनके अलग - अलग लीलाएं हुयी है,  श्री हरी विट्ठल अर्थात भगवान् श्री कृष्ण का एक अद्भुत रूप जो अपने भक्त पांडुरंग के वश में धारण किये, भगवान् भक्तवत्सल हैं और इस बात का प्रमाण वे सदैव देते रहते हैं।  वे अपने भक्तों के लिए कुछ भी कर सकते हैं, ऐसे ही एक भक्त पुंडलिक हुए जिनकी अनन्य भक्ति के कारण भगवान् श्री कृष्ण स्वयं बैकुंठ धाम से पंढरपुर धाम आये जो की महाराष्ट्र के सोलापुर भीमा और चंद्रभागा नदी तट पर स्थित है। पंढरपुर धाम को दक्षिण द्वारिका के नाम से भी जाना जाता है, वैसे इस धाम की महिमा शास्त्रों में अनंत है क्योंकि यहाँ पर भगवान् के भक्त संत श्री नामदेव, श्री तुकाराम, श्री पुंडलिक और रमाबाई जैसे महान भक्तों ने भगवान् श्री कृष्ण के साथ भक्ति के द्वारा आदान - प्रदान किया।  भगवान् के इस अद्भुत रूप के पीछे एक बड़ी ही सुन्दर घटना है, कि किस प्रकार अपने भक्त पुंडलिक के कहने से भगवान् ने वीट अर्थात ईट पर खड़े हुए और उसी रूप में आज भी भक्तों को दर्शन देते हैं।  ऐसा माना जाता है आज आषाढ़ी एकादशी के दिन भगवान के दर्शन ह...

भगवान् जगन्नाथ स्नान यात्रा

वैसे तो हमारे शास्त्रों में भगवान् जगन्नाथ की ढेरों सारी अद्भुत लीलाएं हैं और उनमें से एक है स्नान यात्रा जो श्री धाम जगन्नाथ पूरी में बड़े ही धूम-धाम से मनाया जाता है।  इस अद्भुत लीला के पीछे बहुत सारी घटनाएं छिपी हुयी है, कैसे जगत के नाथ भगवान् जगन्नाथ एक साथ बहुत सारी लीलाओं को संपन्न करते है और अपने भक्तों के साथ आदान - प्रदान करते हैं।  वैसे ही भगवान् आज के दिन अत्यधिक गर्मी के कारण एक उत्सव के रूप में स्नान पूर्णिमा मनाते हैं और उनके भक्त ढेर सारे जल में अलग - अलग प्रकार द्रव्य और पुष्प के साथ उनका महाभिषेक करते हैं।  और उस दिन भगवान् जगन्नाथ एक विशेष अवतार ग्रहण करते हैं जिसे हम गजवेश के रूप में जानते हैं जो एक भक्त के कहने से जिनका नाम गणपति भट्ट जो गणेश जी के अनन्य भक्त  रहते हैं और भगवान् जगन्नाथ को उसी रूप में देखना चाहते हैं, और भगवान् उनकी इस इच्छा को पूरी करने के लिए अपने नए रूप को धारण करते हैं।  वास्तव में यदि हम भगवान् जगन्नाथ की इन दिव्य लीलाओं को और अधिक जानना चाहते हैं तो कल यह उत्सव न केवल पूरी में ही अपितु श्रील प्रभुपाद की कृपा से सभी इस्का...

पांडवा निर्जला एकादशी महात्म्य

वैसे एकादशी को हम दो कारणों के द्वारा जान सकते हैं कि यह हमारे आध्यात्मिक एवं स्वास्थ्य दोनों दृष्टिकोण से कितना महत्वपूर्ण है।  एकादशी का दूसरा अर्थ "हरिवास" या "माधव तिथि" के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है की कृष्ण के नजदीक होना और अपनी ११ इन्द्रियों (५ कर्म + ५ ज्ञान + १ मन) को भगवान् की सेवा में लगाना। एकादशी महीने में दो बार आती है और उस दिन हम अन्न का उपवास रखकर केवल थोड़े फल अथवा जल से अपने आप को तृप्त करते हैं।  वैज्ञानिक कारणों को यदि देखा जाय तो महीने में २ बार हमारे शरीर को आराम देना चाहिए क्योंकि हमारे पाचन शक्ति अत्यधिक कमजोर पड जाती है और एक दिन यदि हम इसे आराम देते हैं तो पुनः वह ठीक - ठीक कार्य करना प्रारम्भ कर देती है।  आध्यात्मिक कारण को देखें तो यदि हम जिस दिन उपवास रखते हैं उस दिन हमारी इन्द्रियाँ शिथिल पड़ जाती है और ज्यादा परेशान  नहीं करतीं, इस कारण से हम अपनी इन्द्रियों साथ ही साथ मन को बड़ी आसानी से नियंत्रण में ला सकते हैं।  एकादशी तिथि के दिन ही भगवान् विष्णु की अंतरंग शक्ति "एकादशी" ने दैत्य मूरा का वध किया था, तब से उस तिथि का...

आज आधुनिक समाज सुखी क्यों नहीं है?

आधुनिक समाज में श्रमिकों तथा पूजीपतियों में सदैव एक बड़ा झगड़ा चलता रहता है।  यह झगड़ा अंतराष्ट्रीय स्तर तक पहुँच गया है। पूजीपतियों तथा श्रमिकों में स्वामित्व जताने की होड़ में एक दूसरे से कुत्ते-बिल्लियों जैसे लड़ने की प्रवित्ति देखि गयी है। और इस प्रकार से समाज में कभी भी शांति नहीं हो सकती, जब तक हर एक व्यक्ति संसार की प्रत्येक वस्तुओं पर अपना अधिकार जताने का प्रयास करता रहेगा।  ईशोपनिषद का यह शब्द 'ईशावास्य ' अत्यन्त ही महत्वपूर्ण है और हर किसी को यह जानना चाहिए की संसार की प्रत्येक वस्तु पर एकमात्र केवल भगवान् श्री कृष्ण का अधिकार है और भगवान ने जो हमें प्रदान किया है केवल उतने भाग को ग्रहण करते हुए हमें संतुष्ट रहकर अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए , और यदि प्रत्येक व्यक्ति इस सिद्धांत को अपने जीवन में उतारता है तो वह सदैव प्रसन्न और सुखी जीवन व्यतीत कर सकता है। सामायन्तः समाज में हम देखते हैं कि मनुष्य अत्यधिक संचय करने की होड़ में रहता है और इस प्रकार वह जाने - अनजाने दूसरे की संपत्ति को भी चुरा लेता है और पाप का भागीदार बनता है, श्रील प्रभुपाद इसका उदाहरण उपदेशामृत में भी प्रस्...